विधि व्यवसाय से आप क्या समझते हैं? प्रकृति और महत्व बताइये

विधि व्यवसाय न केवल एक पेशा है, बल्कि यह समाज की न्यायिक संरचना का एक महत्वपूर्ण स्तंभ भी है। यह व्यवसाय न्याय, नैतिकता और समाज की भलाई के लिए कार्य करता है। एक वकील का कार्य न केवल कानूनी मुद्दों का समाधान करना होता है, बल्कि समाज में कानून और व्यवस्था बनाए रखने में भी उसकी भूमिका अहम होती है। न्यायपालिका का प्रत्येक सदस्य, चाहे वह न्यायाधीश हो या वकील, समाज में कानूनी जागरूकता बढ़ाने और न्याय सुनिश्चित करने में योगदान देता है।

किसी भी देश का न्याय तंत्र तभी प्रभावी हो सकता है जब उसके विधि व्यवसायी निष्ठा और ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करें। विधि व्यवसाय को लेकर समाज में कई धारणाएँ हैं, कुछ लोग इसे केवल धन कमाने का साधन मानते हैं, जबकि वास्तव में यह एक ऐसा व्यवसाय है जिसमें ज्ञान, नैतिकता और सेवा भावना का समावेश होता है। इस लेख में हम विधि व्यवसाय के अर्थ, इसकी प्रकृति, महत्व और इसकी विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

विधि व्यवसाय से आप क्या समझते हैं? इसकी प्रकृति और महत्व बताइये। विधि तथा साधारण व्यवसाय में क्या अन्तर है?

What do you mean by Legal Profession? Explain its nature and importance. Distinguish between Legal and Orinary business.

विधि व्यवसाय एक महान और आदर्श व्यवसाय है। इसमें विभिन्न प्रकार के विवादों और वादों को वर्तमान विधि, प्रथा तथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों के अनुरूप निपटाया जाता है। विधि व्यवसाय करने वाले व्यक्ति को वकील, वकील, प्लीडर, विधि सलाहकार आदि नामों से पुकारा जाता है।

सबसे पहले विधि व्यवसाय का विकास ब्रिटेन में हुआ था जहाँ कुछ धन सम्पन्न, व्यक्तियों ने इसे समाज सेवा की सद‌भावना के साथ आरंम्भ किया। बाद में इन्हीं धनी व्यक्तियों के उत्तराधिकारियों को बैरिस्टर कहा गया। विधि व्यवसाय से जुड़े लोगों का प्रारंभिक उद्देष्य धन कमाना न होकर केवल जन सेवा था। भारत में भी विधि न्याय प्रशासन विभिन्न शासकों के समय से चला आ रहा था, परन्तु विधि-व्यवसायियों उसमें काई स्थान नहीं था।

अंग्रेजों के भारत में आने के बाद यहाँ आंग्ल विधि का श्री गणेश हुआ। समय के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों में विवाद को बढोत्तरी होने के कारण विधि व्यवसाय में भी वृद्धि हुई। विधि व्यवसाय का आज व्यवसायीकरण होने के बाद भी इसका मूल उद्देश्य पीड़ित मानव-समाज की सेवा करना है।

वकील अधिनियम, 1961 की धारा 2 (1) (झ) के अनुसार, विधि व्यवसाय से तात्पर्य उच्च न्यायालय के किसी वकील या वकील या प्लीडर, मुख्तार या राजस्व अभिकर्ता से है।

विधि व्यवसाय की प्रकृति और महत्व (Nature and Importance of Legal Profession) विधि व्यवसाय एकमात्र ऐसा व्यवसाय है जिसमें विधि व्यवसायी को विभिन्न प्रकार के मानवीय सम्बन्धों तथा कार्यकलापों में सामंजस्य स्थापित करते हुए न्याय हेतु प्रयास करना पड़ता है। यह एक विद्धत व्यवसाय है जिसका उद्देश्य अन्याय और उत्पीड़न का शिकार व्यक्तियों को न्यायालय के माध्यम से राहत प्रदान करना है जिससे कि ऐसे व्यक्तियों के संवैधानिक और मानवीय अधिकारों की रक्षा हो सके और वे सम्मानपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सकें।

अभय. प्रकाश सहाय बनाम उच्च न्यायालय, पटना A.I.R. 1998 Patna में’ यह कहा गया है कि वकालंत का पेशा आरंभ से ही एक उच्च-स्तरीय बौद्धिक और नैतिक व्यवसाय माना जाता रहा है। समाज में इसका प्रतिष्ठित स्थान रहा है। विधिक व्यवसायी न केवल पक्षों की सहायता करता है, बल्कि न्याय प्रशासन में न्यायालयों की सहायता भी करता है। संक्षेप में विधि व्यवसाय की प्रकृति और विशेषताएँ निम्नलिखित है

विधि व्यवसाय की प्रकृति और विशेषताएँ

1. यह एक ज्ञानपूर्ण व्यवसाय है।

2. इसमें विधि व्यवसायी को मानव के विभिन्न संव्यवहारों का ज्ञान रखना होता है।

3. यह एक स्वतन्त्र व्यवसाय है जिसमें सेवा भावना प्रमुख होती है। 

4. इस व्यवसाय में विधि व्यवसायी विभिन्न प्रकार के विश्वास के रिश्तों से बाध्य होता है।

5. इस व्यवसायं में विधि व्यवसायी, द्वारा विज्ञापन करना, दलालों की नियुक्ति और सहारा लेना विधि, और व्यवसायिक नीति के खिलाफ है।

6. इस व्यवसाय में बार और बैंच के बीच मधुर सम्बन्ध होने जरूरी हैं।

7. विधि व्यवसाय में दलालों की नियुक्ति पूरी तरह से वर्जित हैं

8. वकील विधिक नीति के अनुसार मुवक्किल के हितों का न्यासी (Trustee) है। न्यासी की हैसियत से उन्हें वे सभी कार्य करने चाहिये, जो मुवक्किल के हित में हैं।

9. चूँकि विधिक व्यवसाय व्यापार नहीं है, अतः एक वकील को दूसरे वकील के प्रति प्रतिस्पर्धा तथा ईर्ष्या की भावना नहीं रखनी चाहिए।

10. किसी भी वकील को इस प्रकार का कार्य अपने हाथों में नहीं लेना चाहिए, जो उसे व्यवसाय की निष्ठा के कार्य करने के लिए प्रेरित करता, हो।

11. विधिक व्यवसाय नीति के अनुसार एक वकील का यह प्रयास होना चाहिए कि उसके मुवक्किल के हितों का संरक्षण हो। वकील को विरोधी पक्ष से साँठगाँठ नहीं करनी चाहिए।

12. एक वकील को न्यायालय तथा न्यायालय के बाहर न्यायधीशी से मिलने का अवसर मिलता है। विधिक व्यावसायिक नीति के अनुसार इस प्रकारों की सभाओं में उसे न्यायाधीश से गुप्त सम्बन्ध स्थापित नहीं करने चाहिएं।

13. किसी भी वकील को यदि किसी मुकदमें में सफलता मिल जाये तो न्यायाधीश के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार यदि वह किसी मुकदमें में असफल हो जाये, तो न्यायाधीश की आलोचना भी न्यायसंगत न होगी।

14. यदि किसी न्यायाधीश के द्वारा उद्घोषित विधिक पूर्वोक्ति किसी वकील द्वारा उसी न्यायाधीश के सामने उद्धृत की जा रही है तो उसे उस विधिक पूर्वोक्ति की अनावश्यक प्रशंसा नहीं करनी चाहिए और न यह प्रदर्शित करना चाहिए कि पूर्वोक्ति में ज्ञान और विवेक का भण्डार है।

15. एक वकील विभिन्न सभाओं में यदि भाग लेता है और विधि सम्बन्धित सम्भाषण करता है तो उसे यह अधिकार है कि वह बिद्वान न्यायालय के द्वारा दिये गये निर्णयों की आदरपूर्वक आंलोचना कर सकता है, परन्तु इस प्रकारे को लेक्चर देते समय उसे आत्म प्रशंसा नहीं करनी चाहिए।

कानूनी पेशे और साधारण पेशे में निम्नलिखित अन्तर हैं-

1. कानूनी व्यवसाय में वकील, न्यायिक अधिकारी, वादकारी और अन्य न्यायिक कर्मचारी से सम्बन्धित होते हैं, जबकि, सामान्य व्यवसाय में क्रेता, विक्रेता, निर्माता, व्यापारी, उत्पादक, अभिकर्ता आदि होते हैं।

2. विधि पेशे में वकील का अपने पेशे का विज्ञापन करने की मनाई होती है, जबकि सामान्य व्यवसाय में विज्ञापन किये जाने पर कोई रोक नहीं है।

3. विधि पेशे में धन कमाने की बजाय, जन-सेवा का उद्देश्य निहित होता है, जबकि सामान्य व्यवसाय में धन कमाना ही मुख्य उद्देष्य माना जाता है।

4. विधि व्यवसाय में वकील तथा वादकारी का सम्बन्ध विश्वासपूर्ण और गोपनीयता से पूर्ण होता है, जबकि सामान्य व्यवसाय में ऐसा होना आवश्यक नहीं होता।

5. कानूनी पेशे में अभिकत्ताओं (Agents) की नियुक्ति तथा सहायता पूर्णतः वर्जित है, जबकि सामान्य व्यवसाय में दलालों का होना व्यापार की उन्नति के लिए बहुत आवश्यक समझा जाता है।

6. विधि पेशे में विधि व्यवसायियों के लिए विधि की शिक्षा जरूरी होती है, जबकि सामान्य व्यवसाय में कुछ अपवादो को छोड़कर व्यवसायियों के लिए विशेष शिक्षा प्राप्त करना आवश्यक नहीं होता। •

विधि व्यवसाय केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज में न्याय की रक्षा करने का एक सशक्त माध्यम है। यह व्यवसाय केवल धन कमाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सेवा, नैतिकता और समाज में न्याय की स्थापना की भावना निहित होती है।

प्रतिषेध रिट क्या है? What is prohibition writ?

चलत प्रत्याभूति का प्रतिसंहरण Revocation of continuing guarantee

प्रस्ताव की संसूचना कैसे होती है How is a proposal communicated?

प्रतिषेध रिट व उत्प्रेषण रिट में अंतर स्पष्ट कीजिए। Difference between prohibition writ and certiorari writ

समाज में विधि व्यवसायियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे न केवल व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करते हैं, बल्कि न्यायालयों के माध्यम से कानून के अनुपालन को भी सुनिश्चित करते हैं। आधुनिक समाज में विधि व्यवसाय को और अधिक नैतिक, पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने की आवश्यकता है, ताकि न्याय हर व्यक्ति को समान रूप से मिल सके। एक सच्चे विधि व्यवसायी को केवल अपने मुवक्किल के प्रति ही नहीं, बल्कि समाज, न्यायालय और कानून के प्रति भी अपनी जिम्मेदारियों का पूर्ण रूप से पालन करना चाहिए। यदि सभी विधि व्यवसायी अपने कार्यों में ईमानदारी और सत्यनिष्ठा का पालन करें, तो न्याय प्रणाली और अधिक प्रभावी और निष्पक्ष बन सकती है।

इस प्रकार, विधि व्यवसाय को केवल धन कमाने का साधन न मानकर, इसे समाज सेवा और न्याय की रक्षा के रूप में अपनाना चाहिए।

इस विसये से जुड़े कुछ कीवर्ड्स –

भारत में विधि व्यवसाय का विकास
विधि व्यवसाय in English
विधि व्यवसाय की परिभाषा
विधि व्यवसाय का महत्व
विधि व्यवसाय की प्रकृति
विधिक आचार का अर्थ
न्याय प्रशासन विधिक व्यवसाय की भूमिका
विधि व्यवसाय की प्रकृति एवं गुण

Leave a Comment